एलीट महिलाएं : आधुनिक जीवनशैली पर व्यंग्य करती विद्या त्रिपाठी की स्वरचित कविता

AVS Post | साहित्य डेस्क

समकालीन समाज में बदलती जीवनशैली, सामाजिक व्यवहार और आधुनिक सोच पर व्यंग्य साहित्य हमेशा से अपनी अलग पहचान रखता है। इसी क्रम में लेखिका विद्या त्रिपाठी की स्वरचित कविता “एलीट महिलाएं” आधुनिक शहरी जीवन के कुछ पहलुओं को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करती है।

कविता में लेखिका ने समाज के एक वर्ग की जीवनशैली, दिखावे, सामाजिक गतिविधियों और बदलती प्राथमिकताओं को अपने दृष्टिकोण से शब्द दिए हैं। यह रचना एक साहित्यिक अभिव्यक्ति है, जिसका उद्देश्य पाठकों को सोचने और चर्चा करने का अवसर देना है।

नीचे प्रस्तुत है कविता, जैसी लेखिका ने लिखी है


एलीट महिलाएं

ना हंसती है न कहती है,
कही चुपके से तकती है,
जो मिल गई नज़र से नज़र,
नज़रो से फिर तौलती रहती हैं,

सभ्य होने का हौसला लिए,
असभ्य दुनिया को समझती है,
चटकीले रंगों से खुद को दूर,
काले लिबासों में ज्यादा दिखती है,

कभी जुल्फे कभी पलके,
सजाती, संवारती रहती है,
जो कमतर दिख ना जाए कही,
मन में मुसलसल सोचती रहती है,

जो बल पड़ जाए माथे पर,
सिकन ना आने देती है,
ये मेंहदी क्या, क्या है आलता,
जिरह ये करती रहती है,

क्या है करवा की ये रस्में,
हंसती पूछती रहती है,
क्लबों को काबा से क्या कम,
किटी को मक्का समझती है,

जो मिल जाए मयखाना,
फिर देखो कैसे झूमती रहती है,
इन्हें फुर्सत नहीं खुद से,
ना फुर्सत इनकी सखियों को,

एलीट महिलाएं है जी ये,
बड़ा ही व्यस्त रहती है,
एलीट महिलाएं है जी ये,
बड़ा ही व्यस्त रहती है।

— स्वरचित : विद्या त्रिपाठी

एलीट महिलाएं
एलीट महिलाएं

संपादकीय टिप्पणी

यह कविता लेखिका के व्यक्तिगत विचारों और साहित्यिक अभिव्यक्ति पर आधारित है। कविता में व्यक्त भाव, पात्र और विचार लेखक के अपने हैं। AVS Post इन्हें साहित्यिक रचना के रूप में प्रकाशित कर रहा है।

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