आज से ठीक १५ दिन बाद प्रभु श्रीराम अपने घर में विराजेंगे। “मेरे राम श्रृंखला” में आज हम बाबा रहीम दास के राम पर चर्चा करेंगे

“रहीम के राम”
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बाबा रहीम अकबर के नवरत्नों में एक व तुलसी बाबा के समकालीन थे। वो एक अकबर के शौर्यशाली योद्धाओं व सेनापतियों में एक थे। परंतु लोक समाज में अपनी भगवदभक्ति के द्वारा सामाजिक चेतना की अलख जगाए रखते थे। ईश्वर व समसामयिक व्यंग रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं यथा:

खीरा सिर ते काटिए मलियत नमक लगाय
रहिमन करुए मुखन को चहियत यही सजाय

बाबा कबीर,बाबा रैदास की भांति ही रहीमदास के राम निराकार थे। बाबा रहीम हिंदुस्‍तान के रंग में ऐसे रंगे थे कि तुलसी के राम को रहीम के राम में जानना हमें आस्‍था और चैतन्‍यता से भर देता है। बाबा रहीम तुलसीदास जी के मित्र थे और जैसे जैसे मानस पढ़ते गए वो राम और कृष्ण में समाते चले गए। प्रभु राम को माध्यम बना उन्होंने अप्रतिम दोहे लिख कर “अपने राम व उनके रामत्व” को समाज में उदगारित किया। तुलसी बाबा और रहीमन की मित्रता के किस्‍सों के बीच यह जानना भी दिलचस्‍प होगा कि रहीम के राम कैसे हैं?

रामचरित मानस विमल, संतन जीवन प्रान
“हिन्दू जन को वेद सम, जनमहि प्रकट पुरान*

रहीम ने रामचरित मानस को वेद के समान बताया है तो तुलसी के इष्ट राम में भी गहरी आस्था जताई।

गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव
‘रहिमन’ जगत-उधार को, और न कछू उपाय

अर्थात भवसागर के पार ले जाने वाली नाव कोई है तो वह राम की शरण में जाना ही है। संसार से उद्धार पाने का दूसरा कोई उपाय नहीं है।

जो रहीम भावी कतहुं, होति आपने हाथ
राम न जाते हरिन संग, सीय न रावण साथ

अर्थात होनी या भविष्‍य हम नहीं जान सकते हैं। यदि भावी अपने हाथ में होती तो राम हिरन के पीछे न जाते और सीता का हरण नहीं होता।

राम नाम जान्यो नहीं, भई पूजा में हानि
कहि ‘रहीम’ क्यों मानिहैं, जम के किंकर कानि

अर्थात राम नाम की महिमा मैंने पहचानी नहीं और पूजा-पाठ करता रहा। इस तरह बात बनी नहीं बल्कि बिगड़ती ही गई। अंत समय में यमदूत मेरी एक नहीं सुनेंगें।

राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपाधि
कहि रहीम तिहिं आपुनो, जनम गंवायो वादि

अर्थात जिन लोगों ने अपने धन, पद और उपाधि को ही जाना और राम के नाम को जाना नहीं है, उनका जन्म व्यर्थ है। वे केवल वाद-विवाद कर अपना जीवन नष्ट करते हैं।

रहिमन धोखे भाव से मुख से निकसे राम
पावत पूरन परम गति कामादिक कौ धाम

अर्थात यदि कभी धोखे से भी भावपूर्वक मुंह से राम का नाम लिया जाए तो कल्याण हो जाता है भले ही वह व्‍यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, पाप आदि से ग्रस्त क्‍यों न हो।

मुनि नारी पासान ही कपि पसु गुह मातंग
तीनों तारे रामजू तीनों मेरे अंग

अर्थात गौतम मुनि की पत्‍थर रूपी पत्नी अहिल्या; पशुवत वानर सेना एवं आदिवासी निशादराज का कल्‍याण प्रभु श्रीराम ने किया था. कठोरता, पशुवत व्‍यवहार तथा स्‍वभाव की निम्नता ये तीनों दुर्गुण मुझ में भी हैं।अब केवल राम ही मेरा उद्धार करेंगे।

22 जनवरी आते आते राम में रम जाना है और बोलिए:

जय श्रीराम! जय श्रीराम! जय श्रीराम!

लेखक एवं विचार- सन्तोष पांडेय,अधिवक्ता, दिल्ली उच्च न्यायालय

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