स्वर कोकिला ‘लता मंगेशकर’: हमेशा के लिए टूट गई ‘जिंदगी की लड़ी’ पर आपको भूलाया नहीं जा सकता!

नई दिल्ली: सुप्रसिद्ध स्वर प्रतिभा की धनी स्वर कोकिला लता मंगेशकर नहीं रहीं। लता दीदी के नाम से प्रसिद्ध लता मंगेशकर छः दशकों से भी अधिक समय तक भारत सहित दुनिया के असंख्य गीत-संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज किया। इंदौर से मुंबई में उनके पदार्पण ने उन्हें भारतीय संगीत की मुख्यधारा में प्रतिष्ठित किया। विरासत में अपने पिता द्वारा मिली गाने की प्रेरणा को लता ने स्वयं को स्वर कोकिला के रूप विश्व फ़लक पर स्थापित किया। बिना स्कूल का मुंह देखे स्वर व गायन प्रतिभा की धनी कब और कैसे सुर, लय व ताल की मर्मज्ञ बन बैठी, यह लता से अच्छा और कोई नहीं जान सकता है। शिक्षा के नाम पर लता ने मुंबई में अपने संघर्ष के दिनों में हिंदुस्तानी संगीत की तालीम उस्ताद अमान अली खान से मराठी और हिंदी भाषा में सीखी। खेलने-कूदने की उम्र से ही अपने पिता से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू करने वाली लता ने रंगमंच में भी अभिनय किया करती थी। लता के गानों में मिठास उनकी नानी के लोकगीतों से उन्हें मिला है। ऐसा कहा जाता है कि लता के अंदर जन्म से सुरीली व झंकार भरी आवाज, बेहतर अभिव्यक्ति और बात को जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता थी। इसकी झलक लता के त्वरित निर्णय इंदौर से मुंबई की ओर मास्टर विनायक के साथ अपनी छोटी बहन आशा को साथ आने में दिखाई भी दिया। सन 1942 में पिता के गुजरने के बाद मात्र 13 साल की उम्र में चार छोटे भाई-बहन हृदयनाथ, मीना, उषा और आशा की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेते हुए आगे की सफर को अकेले तय किया। स्कूल-कॉलेज का मुंह तक नहीं देखा। लता अपने पिता की मौत के बाद परिवार का खर्च चलाने के लिए पहले फिल्मों में अभिनय किया। संगीत को अपना सब कुछ मान बैठी लता ने शादी नहीं की और कुंवारी ही इस दुनिया से प्रस्थान कर गई। संगीत मेरा सब कुछ है। इसलिए लता जी संगीत के नाम का सिंदूर अपनी मांग में आजीवन भरती रही। वे कहती थी कि संगीत नहीं, तो मैं भी नहीं हूँ। लोग कहते हैं न कि, पति परमेश्वर है और ये मांग में जो मैं सिंदूर भरती हूँ , वही मेरा परमेश्वर है, मेरा सब कुछ संगीत है।

वे इस संदर्भ में सौभाग्यशाली थी कि उनका जन्म एक कुशल मराठी और कोंकणी म्यूजीशियन, क्लासिकल सिंगर और रंगमंच कलाकार दीनानाथ मंगेशकर के मिनी मुंबई जैसे उपनाम वाले शहर इंदौर में हुआ था। और अपने पिता के मित्र और नवयुग चित्रपट मूवी कंपनी के मालिक मास्टर विनायक का भरपूर सहयोग मिला। लता के इतिहास और भूगोल दोनों को बदल कर रख दिया। लता ने अतीत की कठिनाइयों से निकलते हुए स्वर्णिम पथ की ओर बढ़ती गई और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखी।

पार्श्व गायिका के अतिरिक्त और अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे कभी सोच ही नहीं पायी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी की अद्भुत कामयाबी ने इन्हें फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था। इन्हीं विशेषताओं के बल पर लता की प्रतिभा को बहुत जल्द एक पहचान मिल गई। फिर भी ऐसा नहीं है कि उन्होंने कठिन परिश्रम और लगन से कभी मन चुराया हो। अपने काम के प्रति ईमानदारी के साथ सदैव लगी रही।

लता ने अपनी जिंदगी का पहला हिंदी गाना ‘माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू’ को गया जिसे मराठी फिल्म गजाभाऊ के लिए गाया था। लता जब पार्श्वगायन के क्षेत्र में अपना कैरियर बना रही थी तबकी नामी गायिकाओं नूरजहां और शमशाद बेगम जैसी गायिकाओं की शैली की कॉपी न करते हुए अपनी शैली विकसित किया। इसके लिए उन्होंने हिंदी और उर्दू के शब्दों के उच्चारण की बारीकियों को भी सीखी। मिट्टी से जुड़े इस अद्भुत गायन प्रतिभा को सुनना जितना सरल है, गायन कला उतना ही कठिन। सदैव सफ़ेद साड़ी में दिखने वाली स्वर कोकिला का व्यक्तित्व जीवन के मध्यकाल से लेकर संध्याकाल तक सरल और सौम्य रहा। आखिर अंत में यही सौम्यता उनकी पहचान बन गई। इसीलिए उनके अपने जीवन काल में अनेक फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों, सांगीतकारों, गायकों, अभिनेताओं और अभिनेत्रियों से पारिवारिक रिश्ते आजीवन कायम रहे। सुरों की नई-नई परिभाषा गढ़ते हुए सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का गौरव लता जी के नाम है। कुल 30 भाषाओं में 50000 से अधिक गाने का रिकार्ड आपके नाम दर्ज है। भारत रत्न सम्मान और दादा साहब फाल्के पुरस्कार के साथ-साथ और अनेक सम्मान से सम्मानित हुई।

तत्कालीन मशहूर संगीत निर्देशक गुलाम हैदर ने लता मंगेशकर की फिल्म निर्देशक सशाधर मुखर्जी से मिलवाया। लता की पतली आवाज का हवाला देते हुए मुखर्जी ने अपनी फिल्मों में गाना गवाने से मना कर दिया। हालांकि गुलाम हैदर की संगीत पारखी नजर ने लता की स्वर प्रतिभा के खिलाफ बातें सुनने के बाद मुखर्जी से कहा कि साहब आने वाले कल में लता से गाना गवाने के लिए आप तरस जाएंगे, और वही हुआ। लता गायकी और स्वर कोकिला की लता बनकर पूरी दुनिया में छा गई। छः फरवरी 2022 को पूरी दुनिया के प्रशंसकों को छोड़ कर स्वर कोकिला लता चिर यात्रा पर प्रस्थान कर गई।

लता मंगेशकर: जीवन वृत्त

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर, 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में हुआ था। इनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल मराठी रंगमंच के कलाकार थे। इनकी माँ का नाम शेवंती था। दीनानाथ मूलतः गोआ में मंगेशी के रहने वाले थे और इसके आधार पर उन्होंने अपना सरनेम मंगेशकर रखा।  लता स्कूल की पढ़ाई से वंचित रही। 6 फरवरी 2022 को मुंबई में 92 साल की उम्र में निधन हो गया।

फिल्मों में पार्श्वगायन का सफर

लता ने सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का गौरव अपने नाम बना रखा है। फ़िल्मी गीतों के अलावा ग़ैरफ़िल्मी गीत भी गाया। लता ने सन् 1947 में, फ़िल्म “आपकी सेवा में” गीत गाकर अपनी प्रतिभा से फिल्म इंडस्ट्री को परिचय कराया। इस गीत ने लता को फिल्म जगत में एक अलग पहचान दिया। आगे चलकर इन्होंने दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, श्री 420, चोरी चोरी, हाउस नं. 44, देवदास, मधुमती, आजाद, आशा, अमरदीप, बागी, रेलवे प्लेटफार्म, देख कबीरा रोया, चाचा जिंदाबाद, दिल अपना और प्रीत पराई, बीस साल बाद, अनपढ़, मेरा साया, वो कौन थी, आए दिन बाहर के, मिलन, अनीता, शागिर्द, मेरे हमदम मेरे दोस्त, दो रास्ते, जीने की राह जैसी अनेक फ़िल्मों में गाने गाये है। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बडी़ बहन” आदि फ़िल्मों में अपनी आवाज़ के जादू से इन फ़िल्मों की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए। इस दौरान आपके कुछ प्रसिद्ध गीत थे: “ओ सजना बरखा बहार आई” (परख-1960), “आजा रे परदेसी” (मधुमती-1958), “इतना ना मुझसे तू प्यार बढा़” (छाया- 1961), “अल्ला तेरो नाम”, (हम दोनो-1961), “एहसान तेरा होगा मुझ पर”, (जंगली-1961), “ये समां” (जब जब फूल खिले-1965), सत्यम शिवम सुंदरम, और यशोमती मैया से बोले नंदलाला इत्यादि।

पुरस्कार

लता ने अपने गायन प्रतिभा के बल पर भारत सरकार द्वारा प्रदत्त भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण, और दादा साहब फाल्के पुरस्कार। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, सात फिल्मफेयर अवार्ड्स, और महाराष्ट्र राज्य के पांच राज्य फिल्म पुरस्कार और बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा 15 अवार्ड्स प्राप्त किया।

 लेखक: डॉ. शम्भू शरण गुप्त

Email: naharguptass@gmail.com

डिप्टी डीन एवं एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म एंड मास कम्यूनिकेशन

महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इंफार्मेशन टेक्नालॉजी, महर्षि नगर, नोएडा सेक्टर 110, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश

 

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