Kanha Ke Ghar Ki Kavi Goshti
कान्हा के घर की कवि- गोष्ठी में गूँजी कविता कल्याणी
यह मत पूछो कब होगा
जब माधव चाहेंगे सब होगा
जय श्रीराधे कृष्णा
श्री कृष्ण को समर्पित गाजियाबाद की संस्था *कान्हा के घर की कवि गोष्ठी की मासिक -कवि गोष्ठी गूगल मीट पर ऑनलाइन संपन्न हुई जिसमें कविता के विविध रंग देखने को मिले….सायं 5 बजे से प्रारंभ कवि गोष्ठी रात्रि 8 बजे तक चली ….
परम आदरणीय प्रबुद्ध जन को सादर प्रणामकरते हुए संस्थापक उपाध्यक्ष डाॅ. अंजु सुमन साधक ने सबके शुभकामना- संदेशों का आभार व्यक्त करते हुए कहा…
*ईश्वर की अनंत कृपा बरसी है कि आज जीवन के एक और नववर्ष में प्रवेश कर लिया है…
अपने जन्मदाता माता-पिता यथा नाम तथा गुण प्रेम लता भटनागर जी एवं स्वर्गीय परम श्रद्धेय नरसिंह स्वरूप भटनागर जी को मेरा सादर नमन … जिनका अनंत स्नेहाशीष प्रतिपल लौकिक और पारलौकिक रूप में बरसता है अपनी संतानों के शीश पर…

आप सबके आशीष की घनेरी छाया हम साधक कवि-युगल का परम संबल है… अपने जन्मदिवस पर मैं आप सबसे मिली उन दुआओं के लिए हृदय से आभारी हूँ… जिन्होंने हम दोनों को भीषण सड़क-दुर्घटना का सामना होने के बाद शीघ्रातिशीघ्र स्वस्थ होने और पुनः साहित्य-समाज सेवा के लिए खड़े होने की हिम्मत दी… मैं अपने पतिदेव परम आदरणीय *श्री मृत्युंजय साधक जी के अनंत, असीम और अनन्य सात्विक प्रेम के प्रति नतमस्तक हूँ… जो मेरे जीवन का आधार है…और हाँ… मेरी प्यारी कान्हा-मंडली तो आज विशेष रूप से मग्न हैं.. क्योंकि आज *कान्हा के घर की कवि-गोष्ठी जो थी जिसके
आयोजक
स्वयं कान्हा-मंडली’ रही…**कान्हा को समर्पित एक भजन *डाॅ.अंजु सुमन साधक*ने आकंठ भक्तिभाव से भरकर प्रस्तुत किया…
मोहन तेरे चरणों की कुछ धूल जो मिल जाए
सच कहती हूँ बस अपनी
तक़दीर सँवर जाए
बस एक तमन्ना हमारे इस जीवन की
तुम सामने हो मेरे और प्राण निकल जाए
कार्यक्रम की अध्यक्षता गजरौला से महाकवयित्री प्रोफेसर डॉ मधु चतुर्वेदी ने की और विशिष्ट अतिथि रहे जयपुर से सुप्रसिद्ध कवि प्रमोद कुमार वशिष्ठ जी…
वहीं कान्हा के घर की कवि गोष्ठी की उपाध्यक्ष डॉ अंजु सुमन साधक ने शानदार और मनमोहक संचालन किया….विशेष बात रही कि 3 जनवरी उनका जन्मदिन भी है…
कान्हा के घर की कवि-गोष्ठी के संस्थापक अध्यक्ष सुप्रसिद्ध लोकप्रिय एवं वरिष्ठ पत्रकार कविवर श्री मृत्युंजय साधक ने सर्वप्रथम अपनी मधुर सुरलहरी छेड़ते हुए माँ वीणापाणि की वंदना प्रस्तुत करते हुए माँ शारदे से कहा-
शारदे माँ सहज भाव को मीत दो
लेखनी को हमारी मधुर गीत दो
अब मनुजता बने धर्म सबसे बड़ा
आसुरी वृत्ति पर दैव की जीत दो
और फिर अपनी धर्मपत्नी डाॅ. अंजु सुमन साधक को उनके जन्मदिन पर समर्पित करते हुए यह प्यारी ग़ज़ल सुनाकर सबका मन मोह लिया…
तब मुक़म्मल हमारी ये यारी हुई
आपकी जब मुहब्बत हमारी हुई
हाव- भावों की तल्खी यूँ तारी हुई
बेज़ुबाँ की ज़ुबाँ आज आरी हुई
ज़िंदगी तो स्वयं में ही इक जीत है
क्यों कहें जिंदगी है ये हारी हुई
दिल की बगिया को पतझड़ की क्यों फ़िक्र हो
ये बहारों के हाथों सँवारी हुई
मन को हल्का बनाए रखें हम सदा
नाव डूबेगी ही ग़र ये भारी हुई
आस से भर गई जब भी ये ज़िंदगी
सुर्ख फूलों भरी एक क्यारी हुई
जो नदी सबको अमृत पिलाती रही
सोचिए क्यों वही आज खारी हुई
जीत जब मिल गई हार में भू कोई
‘ साधकों’ की तभी खत्म पारी हुई
(मृत्युंजय साधक )
वहीं जयपुर से सुप्रसिद्ध कवि एवं विशिष्ट अतिथि श्री प्रमोद कुमार वशिष्ठ ने अनुपम भक्तिभाव से भरकर शिव तांडवस्तोत्र का कंठस्थ वाचन कर सबको चमत्कृत करते हुए यह कविता भी सुनाई…

हर पत्थर को देव समझ कर
पूजे रहा निरंतर सा
मिला नहीं मंतव्य अभी तक
साफल्य हुआ छूमंतर सा
पहुंच शब्द की हुई जहां तक शब्द वहां तक बोये हैं
फसल नहीं आई शब्दों की
छंद कहीं पर खोये है
भाषा सुनी अहम की सबसे
दर्प भारी वाक्यबलिया
दर्द न जाने मन में क्यों है
शूल बनी शब्दावलियां
कलमकार बैठा है कब से
रात रात भर कलम लिए
जैसे व्यसनी बैठा कोई
खोया कर में चिलम लिए
कहीं सुनाताकोई क्षण भर अभी और विश्वास करो
सपने बिखर गए चरणों पर दीपक नया उजास करो
उसी साध्य को लिए कलम से पृष्ठो पर साकार करूं
मधुमासी मौसम कविता
कविता का श्रृंगार करूं
अमा गई तो पूनम के ही
आ जाने का वक्त हुआ
हार न मानी मेरे कवि ने
कविता का अनुरक्त हुआ
मुझे स्वयं ही दीख पड़ा
यह मेरा ही अभियंतर सा
हर पत्थर को देव समझ कर
पूजे गया निरंतर सा
*हर पत्थर को देव समझ कर
पूजे रहा निरंतर सा*
मिला नहीं मंतव्य अभी तक साफल्य हुआ छूमन्तर सा
आओ तुम्हें अपनी नई कविता सुनाते हैं
*कलम में शक्ति कितनी है
खुला जीवन दिखाते हैं*
(प्रमोद कुमार वशिष्ठ जयपुर)
हर पत्थर को देव समझ कर
पूजे रहा निरंतर सा
मिला नहीं मंतव्य अभी तक
साफल्य हुआ छूमंतर सा
पहुंच शब्द की हुई जहां तक शब्द वहां तक बोये हैं
फसल नहीं आई शब्दों की
छंद कहीं पर खोये है
भाषा सुनी अहम की सबसे
दर्प भारी वाक्यबलिया
दर्द न जाने मन में क्यों है
शूल बनी शब्दावलियां
कलमकार बैठा है कब से
रात रात भर कलम लिए
जैसे व्यसनी बैठा कोई
खोया कर में चिलम लिए
कहीं सुनाताकोई क्षण भर अभी और विश्वास करो
सपने बिखर गए चरणों पर दीपक नया उजास करो
उसी साध्य को लिए कलम से पृष्ठो पर साकार करूं
मधुमासी मौसम कविता
कविता का श्रृंगार करूं
अमा गई तो पूनम के ही
आ जाने का वक्त हुआ
हार न मानी मेरे कवि ने
कविता का अनुरक्त हुआ
मुझे स्वयं ही दीख पड़ा
यह मेरा ही अभियंतर सा
हर पत्थर को देव समझ कर
पूजे गया निरंतर सा
(प्रमोद कुमार वशिष्ठ जयपुर)

वहीं प्रकृति के सुकुमार कवि श्री शिव कुमार त्यागी शिवा ने मंगल गीतगान किया…
कृपा करो जग में प्रभु, सबको मीत बनाओ
सत की राह चलें सब, ऐसी लीक बनाओ
दुर्गम इन रास्तों पर, मिल कर कदम बढ़ाएं
मन हो निर्मल, दिल से सारे बैर भुलाएं
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं
मंगल गीत
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं।
निसदिन हम को प्रभु, कुछ ऐसे काज सुझाओ
प्रेम भाव पनपे जग में, सम भाव बढ़ाओ
प्रभात की बेला में, प्रभु दर्शन हो जाएं
खनके दिल के साज, संगीत मधुर बजाएं।
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं।
कृपा करो जग में प्रभु, सबको मीत बनाओ
सत की राह चलें सब, ऐसी लीक बनाओ
दुर्गम इन रास्तों पर, मिल कर कदम बढ़ाएं
यश हो संभव प्रभु, जग में सब नाम कमाएं।
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं।
संकट के पल में प्रभु, जड़ से पीड़ा मिटाओ
मिटे, संताप जग का, यदि बीड़ा तुम उठाओ
हो सुख मय जीवन, जीवों की जान बचाएं
नए साल के दिन सब, गीत खुशी के गाएं।
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं।
करो नित उपकार प्रभु, यह विश्वास दिलाओ
जग हो जाए जन्नत, ऐसी आस जगाओ
मन हो निर्मल, दिल से सारे बैर भुलाएं
कृतज्ञ बनें सब, करुणा रस का पान कराएं।
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं।
दीन दयालु हो प्रभु, धर्म की जीत कराओ
सद्भाव फैले जग में, कोई ऐसी रीत चलाओ
चहकें पंछी उड़ें नभ में, बहती हवाएं
बहे नदी संग में तरु की, डोलें लताएं ।
नव वर्ष की भोर है, दिल में प्रीत जगाएं
आओ मिल जुल सारे, मंगल गीत सुनाएं।

हाइकु
1.
झड़ते फूल
बागों में पतझड़
नव जीवन
2.
आशा के पँख
प्रेरणा का आवेग
लंबी छलांग
हाइकु
*झड़ते फूल
बागों में पतझड़
नव जीवन*
*आशा के पँख
प्रेरणा का आवेग
लंबी छलांग*
(शिव कुमार त्यागी शिवा)
कान्हा के घर की कवि गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं महाकवयित्री डाॅ. मधु चतुर्वेदी जी ने सभी साथियों के नेह-वंदन के साथ प्रस्तुत की नववर्ष किया शुभकामनात्मक कुंडलिया 😊💐
मनचाही मंजिल मिले, हो सुपंथ संधान।
अनुभव बीते वर्ष के,गतिमय करें उड़ान।।
गतिमय करें उड़ान,स्वप्न हों अधिक सुनहरे।
हो भविष्य स्वच्छन्द, भूत के टूटें पहरे।।
जो हो गया व्यतीत,छोड़ आगे चल राही।
ले आये नववर्ष,प्राप्तियां सब मनचाही।।
डॉ. मधु चतुर्वेदी जी ने वहीं सबके मन- मस्तिष्क को झकझोरते वाली यह ग़ज़ल अपने चिरपरिचित मनमोहक तरन्नुम में सुनाई…
यहाँ देखा, वहाँ देखा,इधर देखा,उधर देखा।
नज़ारा जो मिला हमने उसे बस आँख भर देखा।।
न जाने कौन से बोझों से,दुहरे हो रहे सारे,
यहाँ कन्धे ही कन्धे हैं न मैने कोई सर देखा।
जिसे चाहा वही बस ग़ैर के पहलू में जा बैठा,
दुआओं का हमारी,हमने कुछ ऐसा असर देखा।
सलीका है उसे कमज़ोरियां अपनी गिनाने का,
दिलों में घर बनाने का अनोखा ये हुनर देखा।
मिले मंज़िल तो है अच्छा,न मिल पाए तो भी अच्छा,
मेरी यायावरी ने तो सफ़र को बस सफ़र देखा।
अभी गहरा अंधेरा तो उजाला भी कभी होगा,
कभी आकर न जाये कौन सा ऐसा प्रहर देखा।
ख़ुदी में डूब कर जाने मुसलसल ढ़ूँढता है क्या,
मधू इस दिल को अक्सर दो जहाँ से बेख़बर देखा।
(प्रो.(डॉ.)मधु चतुर्वेदी)
मन को मन से सुनने का मन है और सबने महाकवयित्री डाॅ. मधु चतुर्वेदी जी को बेहद मन से सुना भी…
और समाँ बाँधता रहा…
सरिता शर्मा जी की वस्तुस्थिति दर्शाती हुई ग़ज़ल गूँजी…
*प्रीत के गीत गाने से क्या फायदा।
गीत गजलें सुनाने से क्या फायदा।
रीत ही दाद देने की हो ना जहां,
व्यर्थ महफिल सजाने से क्या फायदा।।
आँच इसकी किसी को ना पिघला सके,
तो अजी दिल जलाने से क्या फायदा।
इस गली खिड़कियाँ सबकी सब बंद हैं,
छोड़ चक्कर लगाने से क्या फायदा।
जो फटा दूध है जम वो सकता नहीं,
फिर जमावन लगाने से क्या फायदा।
आप दीपक सही खुद को यूं बेसबब,
दोपहर में जलाने से क्या फायदा।
हाथ खाली रहेंगे जो जाते समय,
दौलतें फिर कमाने से क्या फायदा।
चार कंधे लगाने को कंधा न हों,
शान ‘सरिता’ दिखाने से क्या फायदा।*
सरिता विजय शर्मा
वहीं सरिता विजय शर्मा जी ने एक और नारी अस्मिता पर रचना भी सुनाई
“प्रौढ़ होती गृहणी”
मत कहो कि बूढ़ी होती जा रही हूँ मैं
तस्वीर अपनी एक नयी बना रही हूँ मैं
अनुभव का जीता जागता भंडार बन गई
समझ रही हूँ और कभी समझा रही हूँ मैं
(सरिता शर्मा)
स्व का बोध
स्व का बोध अगर हो जाये
अन्तस् ही ईश्वर हो जाये
बजरंगी-सा सुहृद सन्त हो
राम-कृपा उसपर अनन्त हो
सखा गुणी ज्यों जामवन्त हो
तब अगम्य शत योजन सागर
पार एक वानर हो जाये
स्व का बोध अगर हो जाये
अन्तस् ही ईश्वर हो जाये
जाति-क्षेत्र का क्षीण जहर हो
सत्य सनातन भाव प्रखर हो
गुञ्जित मानवता का स्वर हो
रङ्ग रङ्ग यूँ सङ्ग मिलें ज्यों
इन्द्रधनुष मनहर हो जाये
स्व का बोध अगर हो जाये
अन्तस् ही ईश्वर हो जाये
ख़ुद को क्यों कमज़ोर करें हम
बँटकर क्यों बेमौत मरें हम
संघे शक्तिः मन्त्र वरें हम
बूँद-बूँद पानी ज्यों मिलकर
इक अथाह सागर हो जाये
स्व का बोध अगर हो जाये
अन्तस् ही ईश्वर हो जाये
दुख-दारिद से नहीं डरें हम
प्राणिमात्र के कष्ट हरें हम
सदा ईश का ध्यान धरें हम
श्रद्धा-भाव रखें मन में तो
कंकर भी शंकर हो जाये
स्व का बोध अगर हो जाये
अन्तस् ही ईश्वर हो जाये
✍️डीपी सिंह
पर्यावरण संरक्षण
गीत
बार-बार नाना विधि देती, प्रकृति तुझे संकेत
कि पगले! अब तो जा तू चेत
सुरसरि तो अवतरित हुई थी, पाप मनुज का धोये
आज बिचारी किन्तु विवश है मल शहरों का ढोये
जगत प्राणदा मोक्षदायिनी, ख़ुद ही पड़ी अचेत
कि पगले! अब तो जा तू चेत
यम की बहना की आँखों से आँसू बहना जारी
यम का पाश काटने वाली की देखो लाचारी
नष्ट न कर दें भैया सबकुछ ताज-ओ-तख़्त समेत
कि पगले! अब तो जा तू चेत
कभी क्रोध से तड़ित तड़क कर, रोम-रोम दहलाये
कहीं कहीं अतिवृष्टि फ़सल घर-बार बहा ले जाये
और कहीं पर अनावृष्टि से सूख गये हैं खेत
कि पगले! अब तो जा तू चेत
वन थे जो श्रृंगार धरा के, हमने उन्हें उजाड़ा
प्राण-वायु को तिल-तिल तड़पे, मिली न देकर भाड़ा
जीवन निकला जाये निकले ज्यों मुट्ठी से रेत
कि पगले! अब तो जा तू चेत
✍️डीपी सिंह
कान्हा के घर की कवि- गोष्ठी
में श्री संदीप चौहान एवं * श्रीमती विभा पांडेय की भी महनीय उपस्थिति रही…

