Harish Rana Euthanasia : 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें 32 वर्षीय हरिश राणा (गाजियाबाद/कानपुर क्षेत्र) को Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दी गई। यह भारत में पहली बार किसी व्यक्ति के लिए कोर्ट द्वारा मंजूर पैसिव यूथेनेशिया का मामला है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या होता है? (What is passive euthanasia?)
इच्छामृत्यु (Euthanasia) का मतलब है – किसी गंभीर बीमारी या पीड़ा से जूझ रहे व्यक्ति की जान को जानबूझकर समाप्त करना, ताकि उसकी पीड़ा खत्म हो सके। लेकिन भारत में यह दो तरह से बाँटा जाता है:
- Active Euthanasia (सक्रिय इच्छामृत्यु) : इसमें डॉक्टर कोई दवा या इंजेक्शन देकर सीधे मौत का कारण बनते हैं। यह भारत में गैरकानूनी है और हत्या माना जाता है।
- Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) : इसमें डॉक्टर कुछ नहीं करते – यानी जीवन को अस्वाभाविक रूप से लंबा खींचने वाले उपचार (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब, ट्रेकियोस्टॉमी या न्यूट्रिशन ट्यूब) को हटा दिया जाता है या रोक दिया जाता है। फिर व्यक्ति को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया जाता है, ताकि वह प्राकृतिक मौत मर सके। यह किसी को मारना नहीं, बल्कि अनावश्यक अस्वाभाविक जीवन को रोकना है।

यह तभी अनुमति मिलती है जब:-
- मरीज की हालत पूरी तरह कठिन हो (कोई रिकवरी की उम्मीद न हो)।
- वह पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) या कोमा जैसी स्थिति में हो।
- मेडिकल बोर्ड (प्राइमरी और सेकेंडरी) एकमत से कहें कि रिकवरी असंभव है।
- परिवार की सहमति हो और अदालत मंजूरी दे।
- यह गरिमा के साथ मरने का अधिकार (Article 21 के तहत) मान्य है।

Harish Rana Euthanasia : हरिश राणा का मामला क्या है?
Harish Rana Euthanasia 32 वर्ष, गाजियाबाद/कानपुर क्षेत्र से 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में बी.टेक छात्र थे। रक्षाबंधन के दिन वे चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे गंभीर ब्रेन इंजरी हुई। वे 100% क्वाड्रिप्लेजिक (चारों अंग लकवाग्रस्त) और पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में चले गए।
13 साल से वे बिस्तर पर हैं – बोल नहीं सकते, हिल नहीं सकते, कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। उन्हें ट्रेकियोस्टॉमी (सांस के लिए) और PEG फीडिंग ट्यूब (पोषण के लिए) से रखा जा रहा था।
उनके परिवार खासकर पिता अशोक राणा ने अदालत में याचिका दायर की कि बिना किसी उम्मीद के यह अस्वाभाविक जीवन सिर्फ पीड़ा बढ़ा रहा है। वे चाहते थे कि उपचार हटाकर उन्हें गरिमा के साथ प्राकृतिक मौत मिले।

- पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने मना किया था क्योंकि फीडिंग ट्यूब को कुछ गाइडलाइंस में शामिल नहीं माना गया।
- सुप्रीम कोर्ट ने केस लिया, मेडिकल बोर्ड बनाए (AIIMS आदि से)।
- 11 मार्च 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला दिया – पहली बार भारत में किसी व्यक्ति को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी गई (2018 के Common Cause केस के बाद)।
- कोर्ट ने कहा: फीडिंग ट्यूब भी मेडिकल ट्रीटमेंट है, इसे हटाया जा सकता है।
- हरीश को AIIMS दिल्ली के पैलिएटिव केयर में भर्ती कराकर सुपरवाइज्ड तरीके से उपचार हटाया जाएगा।
- जज पारदीवाला फैसला सुनाते हुए भावुक हो गए, परिवार की भक्ति की सराहना की और शेक्सपियर का “To be or not to be” उद्धृत किया।
- कोर्ट ने सरकार से कहा कि एंड-ऑफ-लाइफ केयर के लिए कानून बनाएँ।
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यह फैसला अरुणा शानबाग (2011) और Common Cause (2018) के बाद एक बड़ा कदम है। अब भारत में पैसिव यूथेनेशिया सख्त शर्तों के साथ संभव है, लेकिन एक्टिव अभी भी गैरकानूनी है।
