Aravalli : भारत की धरती पर फैली अरावली पर्वतमाला न केवल एक भौगोलिक चमत्कार है, बल्कि हमारी सभ्यता की जड़ों से जुड़ी वह प्राचीन कहानी है जो पृथ्वी के निर्माण के समय से चली आ रही है। आज के भारत से कहीं पुरानी यह श्रृंखला, जिसकी उम्र 2.5 अरब वर्ष से अधिक है—एक समय महाद्वीपों के टकराव की साक्षी बनी, लेकिन अब अवैध खनन, शहरी फैलाव और जलवायु परिवर्तन के कारण इसका अस्तित्व संकट में है। यह ब्लॉग अरावली की महिमा, उसके महत्व और चुनौतियों को उजागर करेगा, ताकि हम सब मिलकर इसे बचाने की दिशा में सोच सकें।
Aravalli का जन्म : पृथ्वी के प्रारंभिक युग की स्मृति
सोचिये की एक ऐसा समय जब पृथ्वी पर जीवन की पहली किरणें ही फैल रही थीं—कोई हिमालय नहीं, कोई गंगा नहीं, बस उथल-पुथल भरे महासागर और टकराती प्लेटें। अरावली इसी प्रोटेरोजोइक काल (2.5 अरब से 541 मिलियन वर्ष पूर्व) में जन्मी। इसका मुख्य निर्माण लगभग 1.8 अरब वर्ष पहले हुआ, जब भारतीय क्रेटॉन अन्य महाद्वीपीय टुकड़ों से टकराया। इस ‘अरावली-दिल्ली ओरोजनी’ प्रक्रिया में ज्वालामुखी चट्टानें, ग्रेनाइट और कार्बोनेट की परतें दबाव में मोड़ ली गईं।

ये पहाड़ आज भी अपनी मूल संरचना को संभाले हुए हैं—बैंडेड ग्नीस कॉम्प्लेक्स जैसी प्राचीन चट्टानें जो वैज्ञानिकों के लिए पृथ्वी के इतिहास का खजाना हैं। तुलना करें तो हिमालय मात्र 50 मिलियन वर्ष पुराना है, जबकि अरावली थार रेगिस्तान को उत्तर भारत से अलग रखने वाली प्राकृतिक दीवार है। यह श्रृंखला गुजरात से दिल्ली तक 800 किलोमीटर लंबी फैली हुई है, और इसकी ऊंचाई लगभग 600-900 मीटर है, हालांकि गुरु शिखर (1722 मीटर) इसका सबसे ऊंचा शिखर है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व: राजाओं की ढाल, संतों का आश्रम
Aravalli केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की जीवंत किताब है। प्राचीन काल में यह राजपूत योद्धाओं की रक्षा रेखा बनी—मुगलों के आक्रमणों को रोकने वाली दुर्गम राहें। आमेर, चित्तौड़गढ़ और रणथंभौर जैसे किले इसी श्रृंखला पर बसे हैं, जो वीरता की गाथाएं सुनाते हैं।
सांस्कृतिक रूप से, अरावली आध्यात्मिक केंद्र रही। यहां के मंदिर, जैसे माउंट आबू का दिलवाड़ा जैन मंदिर, कला और भक्ति का संगम हैं। लोककथाओं में इसे ‘अरावत’ कहा जाता है, जहां ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। आज भी यह पर्यटकों को आकर्षित करती है—ट्रेकिंग, वन्यजीव सफारी और प्राचीन गुफाओं के माध्यम से। लेकिन इसका असली महत्व पारिस्थितिक है: यह उत्तर भारत का ‘हरा फेफड़ा’ है, जो मॉनसून को नियंत्रित कर वर्षा लाती है।

पारिस्थितिक खजाना : जैव विविधता और जल संतुलन का आधार
Aravalli का जंगल और वन्यजीव भारत की जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां उड़ान भरती हैं—जैसे ग्रे पैरट्रोट, व्हाइट-बैक्ड वल्चर। तेंदुआ, स्लॉथ बियर, हिरण और जंगली सूअर जैसे जानवर इसके घने जंगलों में छिपे रहते हैं। वनस्पति में धोक, नीम, बबूल और साल जैसी प्रजातियां प्रमुख हैं, जो मरुस्थलीकरण को रोकती हैं।
इसके अलावा, Aravalli जल का प्रमुख स्रोत है। वर्षा का पानी चट्टानों में रिसकर भूजल को रिचार्ज करता है, और लूनी, बनास, साबरमती जैसी नदियां इसी से निकलती हैं। दिल्ली-एनसीआर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों के लिए यह जीवनरेखा है। यदि अरावली न होती, तो थार का रेगिस्तान पूरे उत्तर भारत को निगल सकता था।
वर्तमान संकट : मानवीय लालच का शिकार
दुख की बात है कि यह प्राचीन विरासत आज विनाश की ओर बढ़ रही है। अवैध खनन ने इसके 20% से अधिक क्षेत्र को काट डाला—जस्ता, तांबा, संगमरमर जैसे खनिजों के लालच में। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के इलाकों में मशीनें पहाड़ों को चबा रही हैं, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ा है और बाढ़-भूस्खलन की घटनाएं आम हो गई हैं।
शहरीकरण ने जंगलों को सिमटा दिया—गुरुग्राम और फरीदाबाद जैसे शहरों का विस्तार अरावली को निगल रहा है। जलवायु परिवर्तन से वर्षा अनियमित हो गई, और ग्लोबल वार्मिंग ने जैव विविधता को प्रभावित किया। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि यही सिलसिला चला, तो 2035 तक दिल्ली रेगिस्तानी हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने खनन पर कुछ लगाम लगाई, लेकिन अमल की कमी बनी हुई है।
संरक्षण की राह : सामूहिक प्रयासों से आशा
अच्छी खबर यह है कि संरक्षण के प्रयास तेज हो रहे हैं। केंद्र सरकार का ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ वनरोपण और अवैध खनन पर रोक लगाने पर केंद्रित है। राजस्थान और हरियाणा में स्थानीय समुदाय वनों की रक्षा के लिए आगे आ रहे हैं—जैसे ‘चिपको आंदोलन’ की तर्ज पर पेड़ों को गले लगाकर।

हमें क्या करना चाहिए? व्यक्तिगत स्तर पर अवैध खनन के खिलाफ आवाज उठाएं, इको-टूरिज्म को बढ़ावा दें, और प्लास्टिक-मुक्त अभियान चलाएं। नीतिगत रूप से, सख्त कानून और सैटेलाइट मॉनिटरिंग जरूरी है। यदि हम सब मिलकर कदम उठाएं, तो अरावली को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा सकते हैं।
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अरावली हमारी जिम्मेदारी है
Aravalli सिर्फ पहाड़ नहीं, हमारी पहचान का हिस्सा है—प्राचीन इतिहास की साक्षी, जो हमें याद दिलाती है कि प्रकृति से खिलवाड़ का अंजाम क्या होता है। इसका संरक्षण न केवल पर्यावरण, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने का सवाल है। आज यदि हम जागे, तो कल की दुनिया हरी-भरी रहेगी।
