Article 370 was removed : 5 अगस्त 2019 को भारतीय संसद और राष्ट्रपति भवन में हुए ऐतिहासिक फैसलों ने देश के संवैधानिक इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। उस दिन केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष स्वायत्तता वाले प्रावधान को समाप्त कर दिया। आज सात साल बाद भी यह घटना चर्चा का विषय बनी हुई है। सबसे सटीक और संक्षिप्त तरीके से कहा जाए तो —Article 370 was removed। यह वाक्य न सिर्फ एक कानूनी बदलाव को दर्शाता है, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक ढांचे में आए बड़े बदलाव का प्रतीक भी है।
आर्टिकल 370 क्या था?
आर्टिकल 370 भारतीय संविधान के भाग 21 में “अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान” के अंतर्गत रखा गया था। 1947 में महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया। इसके तहत राज्य को अपना अलग संविधान बनाने, अपना झंडा रखने और अधिकांश आंतरिक मामलों में कानून बनाने का अधिकार मिला। केंद्र सरकार केवल रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे विषयों पर ही सीधे कानून लागू कर सकती थी। बाकी मामलों में राज्य सरकार की सहमति अनिवार्य थी। 1954 में राष्ट्रपति आदेश के जरिए आर्टिकल 35A भी जोड़ा गया, जिसने स्थायी निवासियों को संपत्ति खरीदने और सरकारी नौकरियों में विशेष अधिकार दिए। लंबे समय तक इस प्रावधान को लेकर देश में दो विपरीत विचारधाराएं रहीं। एक पक्ष इसे अस्थायी व्यवस्था मानता था और पूर्ण एकीकरण की मांग करता था, जबकि दूसरा पक्ष इसे जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट पहचान का संरक्षण मानता था।

2019 में क्या हुआ? कैसे Article 370 was removed
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में आर्टिकल 370 को हटाने का वादा किया था। 2019 में भारी बहुमत से सरकार बनने के बाद यह वादा पूरा किया गया। 5 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संविधान आदेश (सी.ओ.) 272 जारी किया। इस आदेश के जरिए आर्टिकल 367 (व्याख्या खंड) में संशोधन कर “संविधान सभा” शब्दों को “विधानसभा” के रूप में पढ़ा जाने लगा। उस समय जम्मू-कश्मीर राष्ट्रपति शासन के अधीन था। उसी दिन राज्यसभा और लोकसभा में प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति से आर्टिकल 370 को निष्क्रिय करने की सिफारिश की गई। 6 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति ने संविधान आदेश 273 जारी किया और आधिकारिक रूप से article 370 was removed। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 भी पारित हुआ, जिसके तहत पूर्ववर्ती राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर (विधानसभा सहित) और लद्दाख (बिना विधानसभा) — में विभाजित कर दिया गया। 31 अक्टूबर 2019 से यह नई व्यवस्था लागू हो गई।
सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला
इस फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गईं। दिसंबर 2023 में मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से सरकार के फैसले को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आर्टिकल 370 अस्थायी प्रावधान था और राष्ट्रपति के पास इसे समाप्त करने की शक्ति बनी हुई थी। इस फैसले के बाद कानूनी रूप से भी Article 370 was removed की पुष्टि हो गई। समीक्षा याचिकाएं भी बाद में खारिज कर दी गईं। न्यायालय ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर को जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाना चाहिए।

Article 370 हटने के बाद के प्रमुख बदलाव
आर्टिकल 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में कई ठोस बदलाव देखने को मिले। अब पूरा भारतीय संविधान क्षेत्र पर लागू होता है। संपत्ति खरीदने, रोजगार और शिक्षा के नियमों में बाकी देश के साथ एकरूपता आई है। केंद्र की कई कल्याणकारी योजनाएं सीधे लागू होने लगीं। सड़क, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यटन के क्षेत्र में निवेश बढ़ा। सुरक्षा स्थिति में भी सुधार के आंकड़े सरकार द्वारा पेश किए जाते रहे हैं। कई नई औद्योगिक इकाइयां और शिक्षा संस्थान खुले। महिलाओं, दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को भी संवैधानिक अधिकारों का समान लाभ मिला। वहीं, कुछ आलोचक स्थानीय रोजगार और भूमि अधिकारों पर असर की बात करते हैं।
सात साल बाद वर्तमान स्थिति
आज 2026 में जब Article 370 was removed के सात साल पूरे हो चुके हैं, तो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दोनों केंद्र शासित प्रदेशों में विकास कार्य तेज हुए हैं। चुनावी प्रक्रिया भी आगे बढ़ी है। पर्यटन में वृद्धि, बुनियादी ढांचे का विस्तार और केंद्र की योजनाओं का विस्तार साफ दिखाई देता है। फिर भी सुरक्षा चुनौतियां और राजनीतिक मांगें बनी हुई हैं। राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग समय-समय पर उठती रहती है।
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कुल मिलाकर, 5 अगस्त 2019 का दिन भारतीय संविधान के इतिहास में याद रखा जाएगा। जिस प्रावधान को अस्थायी कहा गया था, उसे समाप्त कर दिया गया। Article 370 was removed — यह वाक्य अब सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर के नए अध्याय की शुरुआत का प्रतीक बन चुका है। इस फैसले ने संवैधानिक एकीकरण, प्रशासनिक एकरूपता और विकास की नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। देश के बाकी राज्यों की तरह अब जम्मू-कश्मीर भी समान संवैधानिक ढांचे के तहत आगे बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की शांति, समृद्धि और राजनीतिक स्थिरता ही इस ऐतिहासिक फैसले की असल सफलता का पैमाना बनेगी।
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