वो शख्सियत जिन्होंने रखी थी आधुनिक भारत की नींव, लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को हिंदुस्तान कर रहा है याद

 वो शख्सियत जिन्होंने रखी थी आधुनिक भारत की नींव, लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को हिंदुस्तान कर रहा है याद

 

आधुनिक भारत के निर्माण में देश के अनेक नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है पर सरदार वल्लभभाई पटेल की दृढ़ इच्छा शक्ति, साहस, आकांक्षाओं व संभावनाओं का योगदान दिन की रोशनी की तरह साफ दिखती है। आधुनिक भारत से आशय तमिल, तेलुगू, कश्मीरी, असमी, नागा, मणिपुरी तथा क्षेत्र-जाति आधारित अस्मिताओं ने आहिस्ता-आहिस्ता ‘विविधता में एकता’ दर्शाते हुए आधुनिक भारत का निर्माण किए। सर्वाधिक मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली, मिश्रित-अर्थव्यवस्था पर आधारित विकास प्रणाली इसके मूल स्तंभ थे। बात उन दिनों की है जब अंग्रेजों ने ‘बांटो और राज करों’ की नीति पर एक क्षेत्र, वर्ग या संप्रदाय को दूसरे क्षेत्र, वर्ग या संप्रदाय से बांटने का कुचक्र किया। अंग्रेजों की नरम तुष्टीकरण की नीति ने जहां राजाओं, जमींदारों, महाजनों, हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग और अकाली दल के प्रभाव सीमा को बढ़ाया तो वहीं राष्ट्रवादी विचार-धारा के मार्ग में गतिरोध भी उत्पन्न किया। अंग्रेज धर्म के सहारे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का प्रतिपादन करने में सफल हो गए, पर पटेल अंग्रेजों, मुस्लिम लीग व कम्युनिस्टों की भारत को बाटने की विभेदकारी नीति को समझ चुके थे। जून 02, 1947 को लॉर्ड लुईस माउंटबैटन द्वारा अगस्त 15, 1947 को सत्ता हस्तांतरित करने की घोषणा की गई।

देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाले लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल

जुलाई 05, 1947 को रियासत विभाग की स्थापना काल से ही सरदार पटेल ने जिम्मेदारी ली। पटेल ने 500 से भी ज्यादा रियासतों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मात्र बातों से मना लिए थे। अधिकांश रियासतों ने आजादी की पूर्व संध्या से पहले ही ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947’ पर हस्ताक्षर कर दिए थे। पटेल उड़ीसा के 23 राजाओं से कहाकि – “कुएं के मेढक मत बनो, महासागर में आओ।” उड़ीसा के लोगों की सदियों पुरानी इच्छा कुछ ही घंटों में पूरी हो गई। नागपुर के 38 राजाओं से मिलें, जिन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था, यानी जब कोई इनसे मिलने जाता था तो उसे तोप छोड़कर सलामी दी जाती थी। पटेल ने इन राज्यों की बादशाहत को आखिरी सलामी के साथ भारत से जोड़ा। वे काठियावाड़ पहुंचकर वहां की 250 रियासतों को जोड़ा। 20-20 गांव की रियासतों का एकीकरण करते हुए एक शाम पटेल मुम्बई पहुंचे। आस-पास के राजाओं से बात-चीत की और उनकी राजसत्ता को मजबूत भारत निर्माण से जोड़ते हुए पंजाब चल दिए। पंजाब के पटियाला का खजाना देखा तो खाली था। फरीदकोट के राजा ने कुछ आनाकानी की। पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर अपनी लाल पैंसिल घुमाते हुए केवल इतना पूछा कि “क्या मर्जी है?” राजा कांप उठा। लक्षद्वीप समूह को भारत में मिलाया। जो देश की मुख्यधारा से कटा हुआ था। हालांकि यह क्षेत्र पाकिस्तान के नजदीक नहीं था। पटेल जानते थे कि इस पर पाकिस्तान दावा कर सकता है और समय अंदर पटेल ने लक्षद्वीप में भारतीय नौसेना का एक जहाज भेजकर राष्ट्रीय ध्वज फहरवाया। पटेल के 564 देशी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने जैसी चुनौतीपूर्ण कार्य के बारे में हंसराज कॉलेज, दिल्ली के इतिहास के प्रो. शरदेंदु मुखर्जी का कहना है कि – “पटेल दूरदर्शी सोच और व्यवहारिक दृष्टिकोण वाले नेता थे। तभी वे भारत के एकीकरण की बड़ी समस्या को इतने कम समय में हल कर सके थे।”  आखिरकार अगस्त 15, 1947 तक केवल तीन रियासतें – हैदराबाद, कश्मीर और जूनागढ़ को छोड़कर पटेल ने सभी रियासतों को भारत में मिला लिया। पाकिस्तान बनने के बाद पटेल राष्ट्रवादी अवधारणा पर आधारित भारत निर्माण की महत्वाकांक्षी योजना बना रहे थे। एक विराट व अखंड भारत की सीमा रेखा खींचते हुए हैदराबाद और जूनागढ़ के नवाबों को भारत में शामिल होने की बात सोच रहे थे कि अगस्त 15, 1947 को जूनागढ़ के नवाब ने अपनी रियासत को पाकिस्तान के साथ जोड़ने का ऐलान कर दिया। इससे पटेल काफी पेशोपेश में पड़ गए। आजाद भारत के अंदर और कोई आजाद मुल्क हो, ऐसे शब्द पटेल के शब्दकोश नहीं थे। पटेल ने नेहरू और माउंटबैटन से कहाकि – आज हमें फैसला करना है कि हमारे शरीर पर जूनागढ़ के जो घाव पड़े है, उसे रिसने दे, अवाक रहने दे या उसका इलाज कराए? पटेल की बातें नेहरू को अंदर तक झकझोर दिया। नेहरू ने जिन्ना पर जूनागढ़ को ब्लैकमेलिंग करने का आरोप लगाया। पटेल ने सीधे माउंटबैटन से कहाकि – आप जब तक जूनागढ़ पर फौजी कार्यवाही नहीं करंगें, तब तक जिन्ना के ब्लैकमेलिंग से नहीं बच सकते। मेरा मानना है कि हमें जूनागढ़ के लिए कोई सख्त कार्यवाही करनी चाहिए, वरना हमारी नरमी, उसकी कीमत हमें कश्मीर में, हैदराबाद में भी चुकानी होगी। पटेल की बातों से रियासत विभाग के सचिव वी. पी. मेनन भी सहमत थे। लेकिन माउंटबैटन का सलाह जूनागढ़ पर सैनिक कार्यवाही करना भारत के लिए ख़तरा पैदा करना था, इसका अंदाजा पटेल को भी था लेकिन जूनागढ़ में क्या चल रहा है, उसे जानने के लिए मेनन को जूनागढ़ भेजा गया। जूनागढ़ के दीवान ने मेनन को नवाब से न मिलने के कई बहाने किया और मुलाक़ात नहीं कराया। चलते-चलते मेनन ने दीवान शाहनवाज़ भुट्टों से कहाकि – नवाब के इस फैसले से पूरे काठियाबाड की जनता काफी गुस्से में है, अगर जनता का गुस्सा नहीं थमा और अगर कानून अपने हाथ में ले लिया तो इसका मतलब यह होगा कि नवाब के वंश की और उनके राजवंश का खात्मा और इसके जिम्मेदार सिर्फ होंगें आप। मेनन वहां की दो छोटी जागीरों मंगलौर और बावड़ियाबाड को भारत में मिलाते हुए दिल्ली आए।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक राष्ट्रवादी भारत के निर्माण का सपना

दो छोटी जागीरों के भारत में शामिल होने पर नवाब द्वारा वहाँ अपनी फ़ौजे भेजना भारत निर्माण के लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। इसी बात पर पटेल ने कहाकि – अब जूनागढ़ की नाकेबंदी करनी चाहिए। लेकिन माउंटबैटन फौजी कार्यवायी करने के बजाय इसे यू. एन. ओ. में ले जाना चाहते थे। इस बात पर आग बबूला होकर पटेल ने कहाकि – आप सोचते हैं, दूसरे मुल्कों के सामने साख बघारने के लिए हमें यूएनओ जाना चाहिए, ये हमारी बहुत बड़ी भूल होगी, जूनागढ़ के सहारे पाकिस्तान ने हमारे खिलाफ जंग छेड़ी है और उसका सख़्ती से हमें जवाब देना होगा। हमें अपने हक के लिए किसी के सामने अर्जी लगाने की जरूरत नहीं है। माउंटबैटन की एक न सुनते हुए पटेल जूनागढ़ सीमा के इर्ग-गिर्द हिंदुस्तान फौज की नाकेबंदी लगा दी। एक तरफ हिंदुस्तान की फौज और दूसरी तरफ अपनी ही जनता का विरोध देख नवाब डर कर पाकिस्तान भाग गया। पाकिस्तान से मदद की गुहार के बाद कोई मदद और जवाब न मिलने से शाहनवाज़ भुट्टों भारत के सामने समर्पण कर दिया। दरअसल पटेल कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक राष्ट्रवादी भारत के निर्माण का सपना देख चुके थे। लेकिन अंग्रेजी सूचना के बाद बड़ी रियासतें आजाद मुल्क का ख्वाब देखने लगी थी। हिंदुस्तान के दक्षिण की एक बड़ी रियासत त्रावणकोर का दीवान सर सी. पी. रामास्वामी अय्यर आजादी से दो माह पहले जून 11, 1947 को ‘त्रावणकोर आजाद हो गया’ का ऐलान कर चुका था। इस ऐलान से देश टूटने की आशंका बढ़ गई थी। लेकिन त्रावणकोर की आम नागरिकों को सरदार पटेल के सपनों का भारत बनाना था। आम जनता अपने महाराज के खिलाफ विरोध और बगावती तेवर के साथ दीवान के ऊपर जानलेवा हमला कर दी। परिणामस्वरूप आजादी से तीन दिन पहले ही त्रावणकोर के महाराज भारत के साथ रहने को तैयार हो गए। भारत के बीच में भोपाल था, जिसे जिन्ना पाकिस्तान में शामिल होने के लिए कई लालच दे रखा था। बावजूद इसके माउंटबैटन के निजी सलाह से भोपाल के नवाब हमीदउल्लाह ने सरदार पटेल को भारत के साथ शामिल होने का एक पत्र भेजा। भोपाल तो मिल गया पर पटेल अपने सपनों के भारत से दो कदम अभी पीछे थे। ब्रिटेन के बराबर तथा भारत को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ने वाली रियासत हैदराबाद से पटेल काफी परेशान थे। हैदरबाद का नवाब मीर उस्मान अली बहादुर जून 01, 1947 को स्वतंत्र रहने का ऐलान कर चुका था। सलाहकार कासिम रिज़वी दिल्ली आकर पटेल को हैदराबाद को भारत में शामिल होने के दिन में सपने देखने को भूल जाने जैसी चुनौती भी दिया। पटेल ने कहाकि – हैदराबाद को बिना मिलाए आधुनिक भारत की कल्पना महज एक सपना है। पटेल ने अपनी पहली और अंतिम मुलाकात में चुनौती देने वाले कासिम रिज़वी से कहाकि – हैदराबाद का इतिहास इस बात की गवाही नहीं देती कि आप कभी आजाद मुल्क रहें, हैदराबाद हमेशा हिंदुस्तान की रियासत रहा है, और जब अंग्रेज हिंदुस्तान छोडकर चले गए वैसे ही हैदराबाद को अपना आवाम हिंदुस्तान के हाथ देना होगा, इसी में आपकी और आपके निजाम की भलाई है। बावजूद इसके कासिम साहब! अगर आप खुदकुशी करने की सोच रहे हैं तो कोई कैसे रोके सकता है? इसी बीच पाकिस्तान ने हैदराबाद को 20 करोड़ रुपया उधार दे दिया और हथियारें भेजने लगा। इसकी पक्की सूचना पटेल को मिल चुकी थी। पटेल ने हैदराबाद के बगावती तेवर को समझने में तनिक भी देर नहीं की और पाकिस्तान पर सीधा आरोप लगाया।

भारतीय सेना भेजकर हैदराबाद की चारों तरफ से नाकेबंदी कर दी

हिंदुस्तान के ठीक मध्य का हैदराबाद रियासत आधुनिक भारत के निर्माण में बहुत बड़ा पेंच बन चुका था। इस पेंच के नकेल को बिना निकाले पटेल का सपना अधूरा था। इसी बीच हैदराबाद स्टेट का प्रधानमंत्री लायक अली अपने सहयोगियों समेत दिल्ली आया और नेहरू-पटेल दोनों से मिला। लायक अली पटेल से कहाकि – हैदराबाद का भारत में शामिल होना हमारे विकल्प में नहीं है। लेकिन पटेल उसकी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे और उन्होंने लायक अली से कहाकि – मैं आपको किसी उलझन में नहीं रखेंगे। हमारे यहां होने का कोई मतलब नहीं हैं, हम आजाद हैदराबाद के लिए कभी भी सहमत नहीं होंगे। जिससे भारत की एकता तार-तार हो, जिसे हमने खून-पसीने से हासिल की है। फिर भी हम आपकी समस्याओं को सुलझाने के लिए बात-चीत करने को तैयार हैं। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम कभी भी आजाद हैदराबाद के लिए सहमत है। मैं आपको साफ लफ्जों में कह रहा हूँ कि ताकि आपके मन मे कोई शंका न हो। आप सभी वापस जाइए और अपने निजाम से कहिए कि आखिरी निर्णय ले। ताकि पता चले कि हम कहाँ खड़े है? जिस हैदराबाद की एक अलग हैसियत बनने जा रही थी, जिस पर पटेल भी मन मार कर अपनी सहमति जाता चुके थे। लेकिन निजाम की भारत के हर समझौते से बच निकलने के लिए बार-बार पैतरें बदलना दूसरी टर्निंग प्वाइंट के रूप में भारत को मिली। पटेल ने हैदराबाद को भारत में शामिल होने के लिए एक आखिरी खत निजाम को भेजा। शर्तों और मजमून को पढ़ने के बाद लायक अली ने अपने निजाम से कहा कि – इसमें कुछ शर्ते हैं, मेरे ख्याल से ये शर्ते अपनी भलाई के लिए हमें मंजूर कर लेनी चाहिए। लेकिन निजाम ने पटेल के अपील को पूरी तरह से ठुकरा दिया। इसके बाद पटेल ने हैदराबाद को आधुनिक भारत में मिलाने के लिए सितंबर 13, 1948 को भारतीय सेना भेजकर हैदराबाद की चारों तरफ से नाकेबंदी कर दी। पाँच दिन तक युद्ध होने के बाद निजाम भारत के सामने घुटने टेकते हुए भारत में शामिल हुआ। जिसे ‘आपरेशन पोलो’ नाम दिया गया है।

चीन को लेकर पंडित नेहरू को किया था सावधान

1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और चीन का रवैया कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बतलाया था। अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को देखकर पटेल ने कहाकि यह किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा है। उन्होंने यह भी लिखा था कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म दे सकता है। उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पटेल की दूरदर्शिता का लाभ यदि उस समय लिया गया होता तो तब की समस्याएं आज भारत के लिए नासूर नहीं बनती। 1950 में ही गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में चली दो घंटे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्ता सुनने के पश्चात पटेल ने केवल इतना कहा “क्या हम गोवा जाएंगे, केवल दो घंटे की बात है।” पटेल की बात मानी गई होती तो 1961 तक गोवा की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा न करनी पड़ती। मैनचेस्टर गार्जियन समाचार पत्र ने लिखा था कि “पटेल के बिना गांधी जी के विचारों का व्यवहारिक प्रभाव कम पड़ता और नेहरू के आदर्शवाद का क्षेत्र संकुचित हो जाता। पटेल स्वतंत्रता-संग्राम के नायक के साथ स्वातंत्रयोत्तर आधुनिक भारत के निर्माता भी थे। पटेल ऐसे पहले व्यक्ति थे जो एक क्रांतिकारी के साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे।” यदि पटेल इतना दृढ़-निश्चयी नहीं होते तो क्या आजाद भारत का भूगोल ऐसा होता, यह एक सवाल बन सकता है ? महात्मा गांधी ने पटेल को इन रियासतों के बारे में लिखा था, “रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।” महात्मा गांधी से प्रेरित पटेल ने खेड़ा, बोरसाड़ व बारडोली के किसानों को संगठित कर अंग्रेजों की औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ अहिंसक, सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया पटेल ने दांडी यात्रा व नमक सत्याग्रह में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, उन्होंने गांधीजी का पूरी दृढ़ता से समर्थन किया। पटेल को अपनी हिन्दू विरासत पर गर्व था परन्तु वे बहुत धार्मिक नहीं थे। पूरे भारत के मुसलमानों की सुरक्षा और बेहतरी की गारंटी देने के लिये हमेशा तत्पर रहते थे। पटेल ने राष्ट्र की एकता के लिए धर्म में आस्था रखने व उसका अनुपालन करने के अधिकार के अतिरिक्त अपने धर्म का प्रचार करने के अधिकार को भी धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का हिस्सा बनाने के लिये अपनी पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी। धर्म प्रचार के अधिकार को मूल अधिकार बनाने के प्रस्ताव का बहुसंख्यक समुदाय के दक्षिणपंथियों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा था। पटेल ने यह भी सुनिश्चित किया कि अल्पसंख्यकों को उनकी विशिष्ट भाषा, लिपि व संस्कृति का संरक्षण करने का अधिकार मिले और भाषायी व धार्मिक अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करने और उन्हें चलाने का संवैधानिक हक उपलब्ध हो।

जटिल मामलों को आसानी से सुलझाया

सन् 1947 में दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगे में अपने असमझौतावादी व त्वरित निर्णय लेने के स्वभाव के अनुरूप पटेल ने कड़ी कार्यवाही करने की वकालत की, फिर चाहे उसके नतीजे कुछ भी हों। पटेल को जैसे ही यह खबर मिली कि हजरत निजामुद्दीन की दरगाह में शरण लिये हुये हजारों मुसलमान आतंकित और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, वे निःसंकोच बिना किसी भय के तुरन्त दरगाह पहुँचे। उन्होंने दरगाह में लगभग 45 मिनट बिताए। पूरी श्रद्धा के साथ पटेल ने दरगाह में नमन किया और मुसलमानों की सुरक्षा के पूरे इंतजामात करके ही लौटे। पूर्वी पंजाब में सिक्ख बहुत गुस्से में थे। उनकी आँखों में खून उतर आया था। पटेल इस इलाके के कई शहरों में स्वयं पहुँचकर सितम्बर 30, 1947 को सिक्खों से यह अपील किए कि वे समावेशी भारत की इज्जत पर बट्टा न लगायें और उसकी आन-बान-शान को कलंकित न करें। उन्होंने कहा वीरों को यह शोभा नहीं देता कि वे निर्दोष और निहत्थे पुरूषों, महिलाओं और बच्चों का कत्ल करें। नतीजा यह हुआ कि पूर्वी पंजाब के मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षित पश्चिमी पंजाब जाने दिया गया। समावेशी भारत के निर्माता पटेल बाबरी मस्जिद में रात के अंधेरे में भगवान राम की मूर्तियाँ स्थापित किये जाने से अत्यन्त उद्वेलित थे। पटेल एक विशाल और सांझा भारतीय राष्ट्रवाद के पक्षधर थे न कि धर्मगत, जातिगत या नस्ल-आधारित संकीर्ण भारत के। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्दबल्लभ पंत को बल के एकतरफा प्रयोग का मुकाबला बल से करने की सलाह दी थी। भारत को आजाद हुए अभी पाँच साल भी नहीं हुए थे कि भाषा के आधार पर चारों तरफ बटवारें जैसा माहौल, हिंसा, आगजनी, पुलिस फायरिंग और अखबारों के पन्ने इस तरह के ख़बरों से भरे होते थे। इस समाधान के लिए धर आयोगके बाद नेहरू ने स्वयं, पटेल और कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया को शामिल कर एक जेवीपीनाम से नई कमेटी का गठन किया। इस कमेटी के रिपोर्ट ने भाषा के आधार पर राज्यों की गठन की माँग को जायज बताते हुए आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, कर्नाटक और केरल राज्य का गठन किया। सरदार पटेल अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलकर आधुनिक भारत को एक स्वर्णिम अवसर दिया। आज भारत सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों के साथ वैश्विक, विज्ञान एवं तकनीक, शिक्षा, सूचना प्रौद्योगिकी, परिवहन, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यटन आदि से लेकर सामरिक और नागरिक जरूरतों के क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास और नवाचार के क्षेत्र में प्रगति की है। इसके साथ ही वित्त, बैंकिंग, सांस्कृतिक, मनोरंजन और अन्य क्षेत्रों में प्रोद्यौगिकी के साथ अनुसंधान का समन्वय कर रहा है। आज भारत स्वयं को डिजिटल इंडिया बनाने की ओर अग्रसर है। साढ़े चार हजार से ज्यादा सरकारी और गैर-सरकारी उन्नत शोध संस्थान में हजारों भारतीय वैज्ञानिक प्रतिभाएं नई-नई प्रौद्योगिकी की खोज में लगे हुए हैं। सितंबर 24, 2014 को ‘इसरो’ ने पहले ही प्रयास में मंगल ग्रह की कक्षा में अपने अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक स्थापित किया। दुनिया का पहला ई-मेल प्रोग्राम ‘हॉट मेल’ बनाने वाला सबीर भाटिया भारतीय है। आज दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी ‘नासा’ में 36 फीसदी वैज्ञानिक भारतीय हैं। अमेरिका में 38 फीसदी डॉक्टर और 12 फीसदी वैज्ञानिक भारतीय हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बड़ा रसूख रखने वाली आईटी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट के 28 फीसदी भारतीय है तथा उच्चतर अधिकारी सत्य नदेला कुछ वर्ष पूर्व भारतीय थे। आईबीएम के 17, इंटेल के 13 और जिराक्स के 13 फीसदी अभियंता/वैज्ञानिक भारतीय है। आज का केरल विदेशी मुद्रा अर्जित करने में अब्बल है तो वहीं हैदराबाद हाईटेक के क्षेत्र में भारत का अग्रणी राज्य है।

सरदार पटेल के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता

आज विश्व का कोई देश ऐसा नहीं है जहाँ भारतीय मूल के वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों व शिक्षार्थियों ने अपनी पहचान स्थापित नहीं की है। भले ही हमनें गूगल, फेसबुक इत्यादि का आविष्कार नहीं किया है, किन्तु यह सच है कि इन कंपनियों में काम करने वाले कई विशेषज्ञ भारतीय हैं। फ्रांस की प्रयोगशाला में कई वर्षों से हिग्ग्स बोसॉन की तलाश में चल रहे परीक्षणों में 25 फीसदी से अधिक वैज्ञानिक भारतीय हैं। आखिरकार दुनिया में कीर्तिमान स्थापित करने वाले तमाम नागरिक भारत के उन क्षेत्रों से भी हैं जिनका एकीकरण कर पटेल साहब ने 32 लाख वर्ग किलोमीटर का स्वरूप दिया। आधुनिक व शक्तिशाली भारत के वास्तविक निर्माता, संस्थापक और महान क्रांतिकारी सरदार वल्लभभाई पटेल अपनी बेबाक टिप्पणियों और रियासत मंत्रालय के प्रभारी के रूप में महान कार्य करते हुए आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दिए वैसा आज तक कोई भी राजनीतिज्ञ नहीं कर पाया। विश्व इतिहास में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो।

(लेखक डॉ. शम्भू शरण गुप्त महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी नोएडा के स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म एंड मास कम्यूनिकेशन में एसोसिएट प्रोफेसर और डिप्टी डीन हैं।)

 

 

 

 

 

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